फांसी के बारे में कुछ खास बातें!

फांसी देना और लेना कोई आसान काम नही हैं। किसी को फांसी देते समय कुछ नियम का पालन करना पड़ता हैं इसमें फांसी का फंदा, फांसी देने का समय, फांसी की प्रकिया आदि शामिल हैं. आपने आज तक सिर्फ फिल्मों में ही फाँसी देते देखा होगा लेकिन आज हम आपको (फाँसी) से जुड़ी कुछ ऐसी बातें और सवालों के जवाब बताएंगे जो आपको आसानी से नही मिलेगे।

फांसी की सजा सुनाने के बाद जज पेन की निब क्यों तोड़ देते हैं ?

हमारे कानून में फाँसी की सजा सबसे बड़ी सजा हैं. फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब इसलिए तोड़ दी जाती है क्योकिं इस पेन से किसी का जीवन खत्म हुआ है तो इसका कभी दोबारा प्रयोग ना हो. एक कारण ये भी है कि एक बार फैसला लिख दिये जाने और निब तोड़ दिये जाने के बाद खुद जज को भी यह यह अधिकार नहीं होता कि उस जजमेंट की समीक्षा कर सके या उस फैसले को बदल सके या पुनर्विचार की कोशिश कर सके।

फांसी देते वक्त कौन-कौन मौजूद रहते हैं ?

फाँसी देते समय कुछ ही लोग मौजूद रहते हैं इनमें फांसी देते वक्त वहां पर जेल अधीक्षक, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, जल्लाद और डाॅक्टर मौजूद रहते हैं. इनके बिना फांसी नही दी जा सकती।

फांसी देने से पहले जल्लाद क्या बोलता हैं ?

जल्लाद फांसी देने से पहले बोलता है कि मुझे माफ कर दो. हिंदू भाईयों को राम-राम, मुस्लिम को सलाम, हम क्या कर सकते है हम तो है हुकुम के गुलाम।

आखिर सुबह के समय सूर्योदय से पहले ही फांसी क्यो दी जाती हैं ?

फाँसी देना जेल अधिकारियों के लिए बहुत बड़ा काम होता हैं और इसे सुबह होने से पहले इसलिए निपटा दिया जाता है ताकि दूसरे कैदी और काम प्रभावित ना हो. एक नैतिक कारण ये भी हैं कि जिसको फांसी की सजा सुनाई गई हो उसे पूरा इंतजार कराना भी उचित नही हैं सुबह फांसी देने से उनके घर वालो को भी अंतिम संस्कार के लिए पूरा समय मिल जाता हैं।

फांसी से पहले आखिरी इच्छा में जेल प्रशासन क्या क्या दे सकता हैं ?

आखिरी इच्छा पूछे बगैर किसी को फांसी नही दी जा सकती. कैदी की किसी आखिरी इच्छा में परिजनों से मिलना, कोई खास डिश खाना या कोई धर्म ग्रंथ पढ़ना शामिल होता हैं

कितनी देर के लिए फांसी पर लटकाया जाता हैं ?

फांसी से पहले मुजरिम के चेहरे को काले सूती कपड़े से ढक दिया जाता हैं और 10 मिनट के लिए फांसी पर लटका दिया जाता हैं फिर डाॅक्टर फांसी के फंदे में ही चेकअप करके बताता हैं कि वह मृत है या नहीं उसी के बाद मृत शरीर को फांसी के फंदे से उतारा जाता हैं।

मुख्य बिंदु…

1.सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के मुताबिक जिसे मौत की सजा दी जाती है उसके रिश्तेदारों को कम से कम 15 दिन पहले खबर मिल जानी चाहिए ताकि वो आकर मिल सकें।

2.फांसी की सजा पाए कैदियों के लिए फंदा जेल में ही सजा काट रहा कैदी तैयार करता है आपको अचरज हो सकता है, लेकिन अंग्रेजों के जमाने से ऐसी ही व्यवस्था चली आ रही हैं।

3.देश के किसी भी कोने में फांसी देने की अगर नौबत आती है तो फंदा सिर्फ बिहार की बक्सर जेल में ही तैयार होता है इसकी वजह यह है कि वहां के कैदी इसे तैयार करने में माहिर माने जाते हैं।

4.फांसी के फंदे की मोटाई को लेकर भी मापदंड तय है. फंदे की रस्सी डेढ़ इंच से ज्यादा मोटी रखने के निर्देश हैं. इसकी लंबाई भी तय हैं।

5.फाँसी के फंदे की कीमत बेहद कम हैं. दस साल पहले जब धनंजय को फांसी दी गई थी, तब यह 182 रुपए में जेल प्रशासन को उपलब्ध कराया गया था।

6.भारत में फांसी देने के लिए बस 2 ही जल्लाद हैं. ये जल्लाद जिन राज्यों में रहते हैं वहाँ की सरकार इन्हें 3,000 रूपए महीने के देती हैं और किसी को फांसी देने पर अलग से पैसे दिए जाते हैं. आतंकवादी संगठनो के सदस्यों को फांसी देने पर उनको मोटी फीस दी जाती हैं जैसे इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने पर जल्लाद को 25,000 रूपए दिए गए थे।

7.हमारे देश में दुर्लभतम मामलों में मौत की सजा दी जाती है। अदालत को अपने फैसले में ये लिखना पड़ता है कि मामले को दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) क्यों माना गया ?

8. Nike कंपनी का स्लोगन “Just Do It” किसी आदमी को फाँसी देते समय अंतिम शब्दों से प्रेरित हैं।

भारत में फांसी के लिए बिंदु..।

∆भारत में सूर्य उदय से पहले ही फांसी की सजा दे दी जाती है क्योंकि सूर्योदय के बाद जेल के अंदर काम शुरू हो जाते हैं और फांसी के कारण किसी भी कैदी पर कोई भी प्रभाव ना पड़े। इसलिए फांसी यानी सजा-ए-मौत की क्रिया को पहले ही समाप्त कर दिया जाता है।

∆जिस दिन किसी भी कैदी को फांसी की सजा दी जाना तय होती है। उस दिन उसे प्रातः काल 3:00 बजे ही उठा दिया जाता है और फिर उसके सामने दो विकल्प रखे जाते हैं। इन दो विकल्पों में नहाने के लिए गर्म या ठंडा दोनों ही तरह के पानी को दिया जाता है। कैदी का जिस तरह के पानी से नहाने का मन हो वह नहा सकता है। इसके उपरांत कैदी को कुछ धर्म से जुड़ी किताबें भी दी जाती हैं ताकि वह अंतिम समय में जो भी प्रार्थना करना चाहे वह कर सके।

∆भारत में यह सजा इतनी बड़ी मानी जाती है कि इस सजा को सोना देने के बाद जज भी अपने पेन की निब तोड़ देते हैं। क्योंकि उस पेन की वजह से किसी का जीवन समाप्त हुआ होता है और इसका दोबारा प्रयोग करना उचित नहीं है। एक और कारण है जिस वजह से जज पेन की निब तोड़ देते हैं। यह कारण है कि जज के पास में भी यह अधिकार नहीं होता है की फांसी की सजा यानी सजा-ए-मौत देने के बाद जज भी अपने फैसले पर कोई पुनर्विचार या फैसले को बदलने की कोशिश कर सकें।

∆फांसी के वक्त वहां पर जेल अधीक्षक एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट जल्लाद एवं डॉक्टर उपस्थित रहते हैं यदि इन लोगों में से कोई एक भी वहां मौजूद ना हो तो फांसी नहीं दी जा सकती।

∆फांसी से पहले जल्लाद यह बोलता है कि, “ मुझे माफ कर दो हिंदू भाइयों को राम-राम, मुस्लिम को सलाम हम क्या कर सकते हैं हम तो हैं हुकुम के गुलाम।”

∆किसी भी कैदी की फांसी से पहले उसके चेहरे को एक काले सूती कपड़े से पूर्णता ढक दिया जाता है। जिसके बाद फांसी दी जाती है और फिर 10 मिनट तक के लिए मुजरिम को उस फंदे पर लटका दिया जाता है। जिसके बाद डॉक्टर फांसी के फंदे पर लटके हुए मुजरिम को चेक करके यह बताता है कि वह जीवित है या फिर मृत।

∆फांसी के फंदे को कितना मोटा होना चाहिए इसके लिए भी मापदंड को तय किया गया है। फांसी के फंदे की रस्सी  को 10 इंच से ज्यादा मोटा रखने के निर्देश दिए गए हैं।

∆पूरे भारत में केवल दो ही जल्लाद हैं जिन्हें फांसी के दौरान ही बुलाया जाता है। इन्हें इनके राज्य की सरकार द्वारा ₹3000 प्रतिमाह दिया जाता है। जब कभी भी किसी को फांसी देनी होती है तब इन्हें अलग से फीस भी दी जाती है। जब भी किसी आतंकवादी संगठन के सदस्यों को सजा-ए-मौत यानी फांसी दी जाती है तब इन जल्लादों को काफी अच्छी खासी रकम भी दी जाती है। यदि हम बात करें इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी की तो इस दौरान जल्लाद को ₹25000 दिए गए।

∆सुप्रीम कोर्ट द्वारा जिस भी कैदी को सजा-ए-मौत यानी फांसी की सजा दी जाती है। फांसी की सजा से 15 दिन पहले ही घर परिवार वालों को इस बात की सूचना दे दी जाती है ताकि वे आकर मिल सकें।

∆भारत में सजा-ए-मौत को बहुत ही गंभीर या हम कहें कि बहुत ही दुर्लभ माना जाता है। कुछ ही मामले ऐसे होते हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा सुनाई जाती है। सजा सुनाने के बाद जज को यह भी लिखना पड़ता है कि इस को दुर्लभ क्यों माना गया है और क्यों  किसी को भी फांसी की सजा दी जानी चाहिए।

∆भारत में फांसी का फंदा बिहार की बक्सर जेल में तैयार होता है। क्योंकि वहां के कैदियों को फांसी का फंदा तैयार करने के लिये माहिर माना जाता है। भारत में जहां कहीं भी फांसी की सज़ा दी जाती है वहां पर फंदा बिहार से ही मंगवाया जाता है।

∆भारत में मौत की सज़ा बहुत ही गम्भीर या फिर कह सकते हैं बहुत ही दुर्लभतम मामलों में ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाई जाती है। और सज़ा सुनाने पर अदालत को ये लिखना पड़ता है कि आखिर मामले को दुर्लभतम क्यों माना गया है।

∆जिस किसी कैदी को फाँसी की सज़ा सुनाई जाती है उसके लिए फाँसी का फंदा कहीं बाहर से नहीं मंगवाया जाता है बल्कि उसके लिए फाँसी का फंदा जेल में ही सज़ा काट रहा कोई कैदी ही तैयार करता है। और ऐसी व्यवस्था अंग्रेजों के समय से ही भारत में चली आ रही है।

∆सुप्रीम कोर्ट के अनुसार जिन कैदियों को “सज़ा-ए-मौत” दी जाती है उनके घर परिवार को 15 दिन पहले ही इस बात की खबर मिल जानी चाहिए जिससे वो आकर उनसे मिल सकें।

∆भारत में फांसी देने के लिए पूरे देश में केवल दो ही जल्लाद हैं। और ये जल्लाद जिन राज्यों में रहते हैं उन राज्यों की सरकार द्वारा इन जल्लादों को 3000रु महीने का दिया जाता है। और किसी को फांसी देने पर इन्हें अलग से फीस मिलती है। और वहीं जब आतंकवादी संगठनों के सदस्यों को फांसी दी जाती है तो जल्लादों को मोटी रकम दी जाती है। जैसे कि इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने पर जल्लाद को 25000 रुपए दिए गए थे।